राम रहीम को बार-बार पैरोल क्यों 8 साल की सजा में 387 दिन बाहर रहने पर सवाल
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर पैरोल को लेकर सुर्खियों में हैं बीते वर्षों में उन्हें कई बार पैरोल और फरलो मिली है जिस पर लगातार सवाल उठते रहे हैं आंकड़ों के मुताबिक राम रहीम ने अपनी 8 साल की सजा के दौरान कुल 387 दिन जेल से बाहर बिताए हैं यही वजह है कि अब एक बार फिर उनकी पैरोल पर सार्वजनिक बहस तेज हो गई है।
राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलने पर सवाल उठे।पैरोल क्या है और 8 साल की सजा में 387 दिन बाहर का गणित
पैरोल एक कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत अच्छे आचरण पारिवारिक कारण या विशेष परिस्थितियों में किसी कैदी को सीमित समय के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जाती है हालांकि यह राहत सभी कैदियों को समान रूप से नहीं मिलती इसी असमानता को लेकर राम रहीम के मामले में सवाल उठ रहे हैं कि क्या नियम सभी पर एक जैसे लागू हो रहे हैं राम रहीम को 2017 में साध्वी यौन शोषण मामले में दोषी ठहराया गया था और उन्हें सजा सुनाई गई थी इसके बाद से लेकर अब तक वह कई बार पैरोल पर बाहर आ चुके हैं उपलब्ध जानकारी के अनुसार अलग-अलग अवसरों पर मिली पैरोल और फरलो को मिला कर वह करीब 387 दिन जेल से बाहर रह चुके हैं यह अवधि कुल सजा के मुकाबले काफी ज्यादा मानी जा रही है जिस पर सामाजिक और कानूनी हलकों में सवाल उठ रहे हैं।
पैरोल पर उठ रहे मुख्य सवाल: कानून और नैतिकता की बहस
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक गंभीर अपराध में सजा काट रहे व्यक्ति को इतनी बार राहत मिलनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि बार-बार पैरोल से न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है वहीं समर्थकों का तर्क है कि अगर नियमों के तहत पैरोल दी गई है तो इसमें गलत क्या है यही दो ध्रुवीय सोच इस मुद्दे को और ज्यादा संवेदनशील बना रही है राम रहीम की पैरोल सिर्फ कानूनी मामला नहीं रह गई है बल्कि यह नैतिक बहस का विषय भी बन चुकी है कई लोगों का मानना है कि कानून की प्रक्रिया के साथ-साथ समाज में संदेश भी मायने रखता है जब एक हाई-प्रोफाइल दोषी को बार-बार राहत मिलती है तो आम कैदियों के अधिकारों और न्याय की समानता पर सवाल खड़े होते हैं।
सरकार और प्रशासन की भूमिका: आगे क्या हो सकता है
हर बार पैरोल मिलने के बाद प्रशासन यह स्पष्ट करता है कि फैसला नियमों के अनुसार लिया गया है सरकार की ओर से भी यही कहा जाता रहा है कि इसमें किसी तरह का विशेष व्यवहार नहीं किया गया हालांकि पारदर्शिता की कमी के आरोप लगते रहे हैं जिससे संदेह और बढ़ जाता है जनता यह जानना चाहती है कि आखिर किन ठोस आधारों पर बार-बार पैरोल दी जाती है विशेषज्ञों के अनुसार अगर पैरोल नीति को लेकर स्पष्टता और समानता नहीं लाई गई तो ऐसे विवाद आगे भी उठते रहेंगे राम रहीम का मामला एक उदाहरण बन चुका है जो भविष्य में पैरोल व्यवस्था में सुधार की मांग को और तेज कर सकता है राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलना सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है बल्कि यह पूरे न्याय तंत्र की निष्पक्षता से जुड़ा सवाल है 8 साल की सजा में 387 दिन बाहर रहना कई सवाल खड़े करता है जिनका जवाब प्रशासन और कानून व्यवस्था को साफ-साफ देना होगा जब तक पारदर्शिता नहीं आएगी तब तक यह बहस थमने वाली नहीं है।