असम के मुख्यमंत्री पर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से पहले लगाई फटकार
मामला क्या है — याचिका के आधार
असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ यह याचिका कुछ विवादित टिप्पणियों और एक वायरल वीडियो को लेकर दायर की गई थी जहाँ दावा किया गया कि उनके कथित शब्दों एवं व्यवहार से कुछ समुदाय के खिलाफ नफरत भड़की है याचिकाकर्ताओं ने FIR दर्ज करने और एक एसआईटी (Special Investigation Team) जांच की मांग की थी हालांकि अदालत ने मामले की गंभीरता को नकारा नहीं पर सुनवाई से इन्कार कर दिया सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले हाई कोर्ट जाना चाहिए था क्योंकि संविधान ने हाई कोर्ट को इस तरह की शिकायतों के लिए पहला न्यायिक मंच बनाया है अदालत ने यह भी कहा कि सीधी शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाना एक डिस्टर्बिंग ट्रेंड (चिंताजनक रुझान) बन गया है खासकर चुनाव जैसे संवेदनशील समय में।
सुप्रीम कोर्ट की ताज़ा टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने सख़्ती से कहा कि हाई कोर्ट की अधिकारिता को कमतर न आँका जाए अदालत ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि उन्होंने Gauhati High Court क्यों नहीं अपना मामला पहले वहां पेश किया उन्होंने यह भी कहा कि अगर हाई कोर्ट से संतोषजनक राहत नहीं मिलती तब वे शीर्ष अदालत में आ सकते हैं मुख्य न्यायाधीश सौर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हर छोटे-मोटे राजनीतिक विवाद को तुरंत देखेगा यह सही तरीका नहीं है यह क्रम न्यायिक प्रणाली में अनुशासन और कानून की मर्यादा का उल्लंघन कर सकता है अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि राजनीतिक चुनावों से पहले इस तरह के मामलों को सीधे सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का रुझान बढ़ रहा है जिससे हाई कोर्ट की भूमिका कमजोर होती जा रही है इसके साथ ही कोर्ट ने राजनीतिक दलों और याचिकाकर्ताओं से संवैधानिक मर्यादा और संयम बरतने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
भारत के संविधान के तहत हर राज्य का हाई कोर्ट ही पहला न्यायिक मंच है जब किसी सरकारी अधिकारी के कार्यों या टिप्पणियों पर चुनौती दी जाती है हाई कोर्ट को पहले मौका देना इसलिए जरूरी है ताकि साक्ष्य और तर्क तर्कशक्ति की समीक्षा स्थानीय स्तर पर हो सके इसके बाद अगर पक्ष संतुष्ट नहीं होते तभी मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाता है सुप्रीम कोर्ट उस स्तर पर हस्तक्षेप करती है जहाँ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन मूल अधिकारों की रक्षा या कानून-व्यवस्था का गंभीर संकट हो लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे पहले स्तर की सुनवाई समिति नहीं मानना चाहिए इससे न केवल सुप्रीम कोर्ट पर भार बढ़ता है बल्कि न्याय प्रक्रिया भी धीमी पड़ती है।
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